Thursday, November 19, 2009

नाटक : सम-बंध - सुमीता प्रवीण केशवा

बाज़ार में जल्द ही उपलब्ध होगी

समलैंगिक सम्बंधों पर आधारित एक संग्रहणीय नाटक

अपमान रचयिता का होगा- संतोष श्रीवास्तव (वरिष्ठ लेखिका,पत्राकार)

पिछले साल फर्नीचर मॉल में मेरी मुलाकात दो महिला पुलिसकर्मियों से हुई जो समलैंगिक थीं और अपना आशियाना बनाने के लिए फर्नीचर की खरीद-फरोख़्त कर रहीं थीं। उनके चेहरे की खुशी देखने लायक थी। मैं देख रही थी कानून के क्षेत्रा के समलैंगिक कार्यकर्ताओं को समलैंगिकता के वैध घोषित होते ही खुलेआम अपने संबधों को स्वीकृति देते। कानून मंत्री वीरप्पा मोइली का वक्तव्य है कि समलैंगिकता पर दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले का विरोध नहीं करना चाहिए। भारत ऐसा 127 वां देश है जहां फिलहाल समलैंगिकता वैध है जबकि 80 देशों में इसे अपराध मानते हैं।

दुनिया में कितनी चीजें अप्राकृतिक हो रही हंै। मनु द्वारा स्थापित विवाह संस्था भी तो दूषित हो गई है जहां पति-पत्नी में समझौता न होना, अप्राकृतिक सैक्स आदि के मामले सामने आये हैं। कामसूत्र, खजुराहो की मूर्तियां, कोर्णाक मंदिर की मूर्तियां ऐसे अप्राकृतिक काम के उदाहरण हैं। अदालत ने जो इसे मान्यता दी है वह पर्याप्त शोध और तर्कों पर आधारित है। हर व्यक्ति में नर-मादा के अंश पाये जाते हैं। जो व्यक्ति अंतर्मुखी होते हैं और घर,परिवार, अड़ोस-पड़ोस मित्रों के जमावड़े में तिरस्कृत होते हैं उनमें प्रायः समलैंगिकता के प्रति झुकाव होता है। संयुक्त परिवारों में विवाह से पूर्व लड़के लड़की के प्रति अति कठोर रवैय्या अपनाया जाता है। यदि वे पास-पास बैठ भी गये तो इस पर भी घर के बड़े बूढ़े आपत्ति उठाते हैं-‘‘तू लड़कों के बीच क्या कर रही है ? या........इस तरह के कपड़े क्यों पहने हैं ? शरीर के उभारों को ढंक कर रखना सीख.....वगैरह,वगैरह । लड़की के नारीत्व को जब इस तरह दबाया जाता है तो उसके अंदर का पुरुष अंश जागृत हो जाता है। और समलैंगिकता को बढ़ावा मिलता है।

खबर है कि दिल्ली हाईकोर्ट से हरी झंडी मिलते ही चंडीगढ़ में तीन समलैंगिक जोड़ो ने खुल्लम-खुल्ला विवाह कर लिया। ऐसी घटनायें हमें सोचने पर मजबूर करती हैं कि चाहे कानून इस बात के लिए अपनी स्वीकृति दे या न दे इंसान ऐसे संबंधों से इंकार नहीं कर सकता। क्योंकि यह उसके शरीर और व्यवहार की मांग है।

ऐसे संबंधों को लेकर विभिन्न मठों के मठाधीश,साधु संत और बाबाओं के अपने तर्क हैं। वे ब्रह्मचर्य को ईश्वर प्राप्ति की महत्वपूर्ण कड़ी मानते हैं। यदि सभी व्यक्ति ब्रह्मचारी हो गये तो सृष्टि का क्या होगा ? विधाता की सर्वश्रेष्ठ कृति मानव का समूल विनाश हो जाएगा। एक ओर ईश्वर को पाने के लिए ब्रह्मचर्य पालन और दूसरी ओर उसकी कृति का अपमान ! प्रश्न यह भी उठ सकता है कि ऐसी स्थिति में संतानोत्पत्ति असंभव है। विज्ञान ने इसका भी हल खोज निकाला है ‘किराये की कोख‘ न केवल विज्ञान बल्कि हमारा पौराणिक युग भी इस बात का साक्षी है।

सुमीता प्रवीण ने मकड़जाल में उलझे ऐसे सम्बन्धों पर समयानुकूल नाटक लिखा है। इस विषय पर कलम उठाने के लिए मैं उनके साहस की सराहना करती हूं। और यह कामना भी कि अगर यह नाटक मंचित हो तो अधिकाधिक लोगों तक यह बात पहुंचेगी।

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यह पुस्तक प्रगति मैदान, नई दिल्ली में 30 जनवरी 2010 से 7 फरवरी 2010 तक, 19वाँ विश्व पुस्तक मेला के दौरान हिन्द-युग्म के स्टॉल (हॉल नं॰ 12A, स्टॉल नं॰- 285) पर विक्रय के लिए उपलब्ध है। जरूर पधारें।

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2 पुस्तकप्रेमियों का कहना है कि :

shann का कहना है कि -

sumita ji dwara likha gaya yeh natak mujhe bahut pasand aya,sumita ji aadhunik bharat ka aaina dikha rahi hai,nai pidhi dhire dhire samlegita ke or jhuk rahi hai,un ke dwara udhaye gaye is kathan ke or hamara dhyan janna chahiye,or is per humey milker vichar karna cahahiye

seema का कहना है कि -

didi teri book ki samiksha padi achhi lagi. god se prey hai ki tu kamyab ho. isi trah se likhti rhe. all the best. dabbu

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